आसमाँ सर पर उठा रखा है

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ये क्या हाल बना रखा है
आसमाँ सर पर उठा रखा है

इतना शोर क्यों मचाते हो
राई का पहाड़ बना रखा है

तेरे मेरे बीच की बात थी
दुनिया जहाँ को बुला रखा है

वफ़ा पर बहस मंज़ूर नहीं
शक को खाई बना रखा है

आईना सबको दिखाते हो
खुद का नाम खुदा रखा है

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न रूठ इतना भी किसी बहाने के लिए

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ऐ दिल न रूठ इतना भी किसी बहाने के लिए
ऐसा न हो कुछ बचे ही न मनाने के लिए

न कर यूँ बेक़दरी हर इल्तिजा हर फ़रियाद की
कि हाथ ही न कोई बचे दुआ में उठाने के लिए

न कर इतना भी यकीन अपनी इस मोहब्बत पर
वजह कोई काफ़ी नहीं उसे अमर बनाने के लिए

नज़र चुरा जो लेते तो भी अपने से ही लगते
पहचानो तो कुछ बोलूं याद दिलाने के लिए

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कहती हो कि आदतें अच्छी पाल रखी हैं तुमने

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कहती हो कि आदतें अच्छी पाल रखी हैं तुमने
फिर ये आदतें ही क्यूँ बुरी लग जाती हैं तुम्हें
बेवजह ही चुप रह जाना
बस यूँ ही कभी भी खुश हो जाना
डर को तुम्हारे हँसी में टाल देना
बेखबर लापरवाह ही सही
पर जिए जाना भी तो एक आदत ही है
पैर छूना भी तो एक आदत सी ही है
मतलब पता होता तो तुम्हारे न छू लेता
हाँ कभी बेमानी सी लगती हैं ये आदतें
मन का तुम्हारे क्या हाल है
तुम नहीं बताती तुम्हारी आदतें बता देती हैं
मन को जैसे भाँप जाती है ये आदतें
मुझको मैं और तुमको तुम बनाती हैं ये आदतें
फिर ये आदतें ही क्यूँ बुरी लग जाती हैं तुम्हें

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